अपने वक्तव्य में उन्होंने स्वदेशी विचारधारा के महत्व को रेखांकित करते हुए आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना को व्यवहार में उतारने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि स्वदेशी अपनाना केवल आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय दायित्व है। स्थानीय उत्पादों, परंपराओं और मूल्यों को अपनाकर ही समाज दीर्घकालिक सशक्तिकरण की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
सम्मेलन का वातावरण ऊर्जा, प्रेरणा और संगठनात्मक संकल्प से परिपूर्ण रहा। कार्यकर्ताओं और उपस्थित जनसमूह ने डॉ. तोगड़िया जी के विचारों को आत्मसात करते हुए समाजसेवा, राष्ट्रसेवा और सांस्कृतिक चेतना के विस्तार का संकल्प लिया। यह आयोजन न केवल विचार-विमर्श का मंच बना, बल्कि हिंदू जागरण और स्वदेशी चेतना को जन-जन तक पहुँचाने की दिशा में एक सशक्त कदम सिद्ध हुआ।